नई दिल्ली: कुछ परिवारों का इंतजार कुछ सप्ताह चला, जबकि कुछ के लिए यह कई वर्षों तक खिंच गया। उनके लापता परिजन देखभाल गृहों में दूसरे नामों से रह रहे थे, क्योंकि वे अपना नाम, पता या परिवार की जानकारी नहीं बता पा रहे थे।
दिल्ली पुलिस की एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU), क्राइम ब्रांच ने कहा कि 21 दिनों के विशेष अभियान के दौरान 13 लापता लोगों का पता लगाया गया। इनमें छह नाबालिग और सात संवेदनशील या विशेष आवश्यकता वाले व्यक्ति शामिल थे। पुलिस ने उनके परिवारों अथवा संबंधित मामलों की जांच कर रहे अधिकारियों से संपर्क स्थापित करने में मदद की।
23 सितंबर की क्राइम ब्रांच प्रेस विज्ञप्ति में दर्ज मामलों में रेलवे स्टेशनों पर अकेले मिले बच्चों से लेकर मानसिक स्वास्थ्य या बौद्धिक अक्षमता से जूझ रहे ऐसे वयस्क शामिल हैं, जो वर्षों तक आश्रय गृहों में रहे और अपनी पहचान नहीं बता सके।
करीब चार साल बाद मिला अपना नाम
सबसे लंबी जुदाई वाले मामलों में हेमंत का मामला शामिल था, जो अगस्त 2022 से कल्याणपुरी से लापता थे। पुलिस के अनुसार, वह सरस्वती विहार में बैंक ऑफ बड़ौदा के पास बेसहारा अवस्था में मिले थे। पहचान नहीं बता पाने के कारण उन्हें अपना घर आश्रम में रखा गया, जहां वह “विजय” नाम से रह रहे थे।
करीब चार साल बाद उनके छोटे भाई नरेंद्र और चाचा रामदास को पहचान के लिए आश्रम ले जाया गया। दोनों ने उन्हें हेमंत के रूप में पहचाना। औपचारिक पहचान के बाद उन्हें आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के लिए कल्याणपुरी थाने ले जाया गया।
विज्ञप्ति में कुनाल के रूप में पहचाने गए एक अन्य व्यक्ति जून 2024 से गाजियाबाद से लापता थे। मिलने के समय वह अपनी पहचान नहीं बता सके, इसलिए आश्रम के रिकॉर्ड में उनका नाम “मुन्ना” रखा गया। बाद में पिता ने पंजाब खोड़ स्थित अपना घर आश्रम में उन्हें पहचान लिया और सत्यापन के बाद दोनों को मिलाया गया।
वीडियो कॉल पर बेटी ने घायल पिता को पहचाना
अभियान ने दिल्ली के एक परिवार को 70 वर्षीय हरदयाल सिंह तक भी पहुंचाया। वह 3 अगस्त को न्यू अशोक नगर स्थित घर से निकले थे। विज्ञप्ति के अनुसार, 13 सितंबर को वह अजमेर में घायल अवस्था में मिले। पैर में फ्रैक्चर के उपचार के बाद उन्हें अपना घर आश्रम भेजा गया।
AHTU कर्मियों ने उनकी तस्वीर और शारीरिक विवरण का मिलान किया। बेटी गुरप्रीत ने वीडियो कॉल पर उन्हें अपने पिता के रूप में पहचाना और कई सप्ताह से अनिश्चितता में जी रहे परिवार को उनकी जानकारी मिली।
एक अन्य मामले में आगरा की 85 वर्षीय महिला मंदिर मार्ग क्षेत्र में मेट्रो पिलर संख्या 33 के पास मिलीं। पता नहीं बता पाने पर उन्हें देखभाल के लिए आश्रम पहुंचाया गया। पुलिस के अनुसार, उनके बेटे ने वीडियो कॉल के जरिए उनकी पहचान की।
आश्रय गृहों और केस रिकॉर्ड से बच्चों की पहचान
छह नाबालिगों में पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली रेलवे स्टेशनों तथा कश्मीरी गेट बस अड्डे पर अकेले मिले बच्चे शामिल थे। पुलिस ने बताया कि उनके विवरण का दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में दर्ज गुमशुदगी रिपोर्टों से मिलान किया गया। जहां जरूरी था, बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया गया और जांच अधिकारियों के माध्यम से आगे की सुपुर्दगी या कानूनी कार्रवाई की गई।
बौद्धिक अक्षमता वाला 12 वर्षीय एक बच्चा सुभाष प्लेस से लापता बताया गया था। वह पीतमपुरा में भटकता मिला और उसे आशा किरण चिल्ड्रन्स होम में रखा गया। उसकी मां, मौसी और शिकायतकर्ता ने वहां उसकी पहचान की। एक अन्य बच्चे की पहचान रिकॉर्ड के मिलान से हुई; अस्पताल में चिकित्सा जांच के दौरान लापता होने के बाद वह अलग-अलग देखभाल गृहों में पहुंचा था।
21 दिनों में 13 जिंदगियां फिर परिवार से मिलीं—AHTU, क्राइम ब्रांच, दिल्ली ने छह नाबालिगों और सात संवेदनशील या विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों का पता लगाया।
— Crime Branch Delhi Police (@CrimeBranchDP) September 23, 2026
कैसे चला तलाश अभियान
क्राइम ब्रांच ने कहा कि टीम ने तकनीकी निगरानी, फील्ड इंटेलिजेंस, मैनुअल जांच और पुलिस थानों, बाल कल्याण समितियों, चाइल्डलाइन कर्मियों तथा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के आश्रय गृहों के साथ समन्वय का सहारा लिया।
डीसीपी क्राइम ब्रांच चंद्र कुमार सिंह द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, अभियान में इंस्पेक्टर मुकेश कुमार, एएसआई अजय कुमार झा और महिला कांस्टेबल मिंटू की टीम ने एसीपी सुरेश कुमार की निगरानी में काम किया।
आधिकारिक विज्ञप्ति की भूमिका में एक स्थान पर 14 पीड़ितों का असंगत उल्लेख है। हालांकि उसके शीर्षक, सारांश, 13 क्रमांकित मामलों और क्राइम ब्रांच की X पोस्ट—सभी में 13 लोगों का आंकड़ा दिया गया है। इसलिए इस रिपोर्ट में समर्थित कुल संख्या 13 इस्तेमाल की गई है।

